धूमकेतु ( Comet )

comet 2

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गिरता हुआ धूमकेतु
धूमकेतु ( Comet ) –

सौरमंडल के छोर पर बहुत ही छोटे – छोटे अरबों पिंड विधमान होते हैं | जो धूमकेतु या पुच्छल तारें कहलाते हैं |

ये सौरमंडल के ऐसे पिंड हैं जो पत्थर, धातु, धूल, बर्फ और गैस के बने हुए छोटे – छोटे पिंड होते हैं | ये ग्रहों के समान सूर्य की परिक्रमा करते रहतें हैं | धूमकेतु का परिक्रमण काल उनके आकार पर निर्भर करता हैं क्योंकि इनके आकार के अंडाकार, वलयाकार या विकृत प्रकार के कारण इनकी गति निश्चित या अनिश्चित पथ में होती हैं | अधिकतर धूमकेतु बर्फ, CO2, मीथेन, अमोनिया तथा सिलिकेट और कार्बनिक पदार्थों के मिश्रण से बने होते हैं |

धूमकेतु केवल तभी दिखाई देता हैं | जब वह सूर्य की ओर अग्रसर होता हैं | क्योंकि सूर्य की किरणे इसकी गैस को चमकीला बना देती हैं | धूमकेतु की पूछ हमेशा सूर्य से दूर होती दिखाई देती हैं |

धूमकेतु को तीन भागों में बाँटा गया हैं –
  1. केंद्र ( नाभिक ) – धूमकेतु का केंद्र पत्थर, कार्बन मोनोक्साइड ( CO ), कार्बन डाई ऑक्साइड ( CO2 ), मीथेन और बर्फ का बना होता हैं | द्रव्यमान कम होने के कारण धूमकेतु अपने गुरुत्व केंद्र ( Center of Gravity ) के अन्तर्गत गोलाकार रूप धारण नही कर पाते और इसलिए इसका आकार अनियमित होता हैं |
  2. कोमा – धूमकेतु अक्सर बाहरी सौरमंडल में पाए जाते हैं | जब धूमकेतु सौरमंडल में प्रवेश करता हैं तो गिरते हुए धूमकेतु से बड़ी मात्रा में निकलने वाली धूल और गैस की धारा धूमकेतु के चारों ओर अत्यंत कमजोर वातावरण बनाती हैं जिसे कोमा कहते हैं |
  3. पूछ – जब धूमकेतु तेजी से नीचे गिरता हैं तो गिरते समय उसमें से एक चमकदार रोशनी निकलती हैं | जो एक रोशनी की चमकदार लाइन समान दिखाई देती हैं | इसे ही पूछ कहा जाता हैं |

धूमकेतु कम द्रव्यमान और अनियमित आकार अनियमित पथ पर गति करने के कारण धूमकेतु कभी – कभी बड़े ग्रहों की ओर आकर्षित होतें हैं | जिसके कारण धूमकेतु की कक्षा पर असर पड़ता हैं | परिक्रमण कक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव के कारण कभी – कभी खोजे गए हुए धूमकेतु भी अपनी कक्षा छोड़कर चले जाते है | इस कारण इनके अध्धयन में मुश्किलें आती हैं |

उदाहरण – हेली धूमकेतु, हेल – बॉप धूमकेतु आदि |

हेली नामक धूमकेतु का परिभ्रमण काल 76 वर्ष है | यह अन्तिम बार 1986 में दिखाई दिया था | अगली बार यह 1986 + 76 = 2062 में दिखाई देगा |

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