डायनासोरों का खात्मा और इरिडियम का जन्म dinosaur

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डायनासोरों का खात्मा और इरिडियम का जन्म
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डायनासोर का जीवाश्म

सरीसृपो ( डायनासोर ) लगभग 16 करोड़ वर्ष तक पृथ्वी पर प्रमुख स्थलीय कशेरुकी जीव थे | ये ट्राईएसिक काल के अंत ( 23 करोड़ वर्ष ) से लेकर क्रीटेसियस काल ( 6.5 करोड़ वर्ष पहले ) के अंत तक अस्तित्व में रहे |

जगतजंतु
संघकशेरुकी
उपसंघरज्जुकी
वर्गसरीसृप
उपवर्गडायाप्सिड
इन्फ्रा-वर्गआर्केसोरोमोर्फा
सुपर आर्डरडाय्नोसोरिया
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इरीडियम सान्द्रता का उल्कापिंड

हिन्दी में डायनासोर शब्द का अनुवाद भीमसरट हैं | जिसका संस्कृत में अर्थ भयानक छिपकली हैं | कुछ डायनासोर ( dinosaur ) शाकाहारी तो कुछ मांसाहारी थे | इनकी कुछ प्रजातियाँ अन्डे देने के लिये घोसलों ( Nest ) का निर्माण करती थी और ये अण्डज थे | वैज्ञानिकों के अनुसार डायनासोरों का अंत पृथ्वी पर उल्कापिंड के टकराने से हुआ था |

  1. रासायनिक चिन्ह – Ir
  2. परमाणु संख्या – 77
  3. इलेक्ट्रोनिक विन्यास – 2,8,18,32,15,2

इरिडियम धातुओं के प्लैटिनम समूह का एक तत्व है | यह बहुत ही कठोर धातु हैं जो लगभग 2450 C पर पिघलती है | इसका आपेक्षिक घनत्व 22.4 हैं | इसका विशिष्ट विधुतीय प्रतिरोध 4.9 हैं जो लगभग प्लैटिनम से आधा हैं |

सबसे पहले तेना ने 1804 में ऑसमीइरिडियम नामक मिश्रण से इसको प्राप्त किया | रासायनिक अभिक्रिया में यह धातुओं में सबसे अक्रियाशील हैं | इसके साथ नाइट्रो-हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ( Aqua Regia / शाहीजल ) भी साधारण ताप पर क्रिया करने में असफल रहता हैं |

इरिडियम का उपयोग

आभूषण, इंजेक्शन की सुई, चुम्बकीय सम्पर्क स्थापित करने वाले यंत्र में, बहुत बारीक फ्यूज तार बनाने में काम आता हैं |

ऐल्वारेज की परिकल्पना –

एल्वारेज की परिकल्पना के अनुसार डायनासोरों और अन्य पुरातन जीवों का नष्ट होने का कारण 6.5 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर एक बहुत विशालकाय क्षुद्र ग्रह ( एस्टेरोयड / उल्कापिंड ) के टकराने की वजह से हुआ था | इस घटना को Cretaceous – Paleogene extinction event कहते हैं | सबूत यह दर्शाते है कि यह उल्कापिंड मैक्सिको के चिकशुल्बू में स्थित यूकातान प्रायदीप में गिरा था | चट्टान का आकार मंगल ग्रह के चंद्रमा  डिमोस के आकार की त्रिज्या ( 6.2 km ) का था | टक्कर से इतनी ऊर्जा निकली होगी, जितनी कि हिरोशिमा व नागासाकी पर गिराए गये परमाणु बम की शक्ति से 9 अरब गुना ज्यादा थी |

एक अध्धयन में दुनिया भर की अवसादी शैल की जाँच के आधार पर पाया गया हैं कि उनमे  K-PG स्तर परत में अत्यधिक मात्रा में इरिडियम नामक धातु का सांद्रता पायी गयी | जबकि यह धातु पृथ्वी की ऊपरी सतहों में कम ही मिलता हैं | पाया गया कि अवसादी शैल K-PG स्तर में औसत से 30 गुना से लेकर 120 गुना इरिडियम की उपस्थिति पायी गयी | वैज्ञानिकों के अनुसार इरिडियम का पृथ्वी पर रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा बनने का कोई विशेष कारण नहीं हैं | क्योंकि इरिडियम लोहे की तरह आकर्षित होने वाला तत्व ( चुम्बकीय पदार्थ द्वारा ) हैं | इसलिए इसकी अधिकांश मात्रा धरती के निर्माण के समय ही चट्टानों में मौजूद लोहे से आकर्षित होने के कारण पृथ्वी के केंद्र में चली गयी | लेकिन इससे मिलती – जुलती इरिडियम सांद्रता कई उल्कापिंडो में मिलती हैं | उल्कापिंड की टक्कर से पृथ्वी पर 10 नील ( 100 ट्रिलियन ) टन T.N.T के बराबर का विस्फोट हुआ होगा, जो मानव द्वारा बनाये गए सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन बम के धमाके से 20 लाख गुना अधिक तेज था | इरिडियम पृथ्वी पर बहुत ही दुर्लभ धातु है, जो अंतरिक्ष में स्थित उल्कापिंड से पृथ्वी पर टक्कर के पश्चात आयी |

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